वियोग

मॉं बाप का वियोग कम्बख़्त चीज़ ही ऐसी है, जग भर के रिश्ते हों चाहे जीवन में.... न कोई पिता सम्मान, न कोई मॉं जैसी है कभी शायद वो भी रोए होंगे इस वियोग वश आज हमारी बारी है, बिछड़ना लगता भारी है क्या कल की पीढ़ी भी सहेगी यह सब? कौन जाने यह वियोग किस किस पर भारी है सिकीलधी

हमारे पूर्वज

हमारे पूर्वज वह सब हमारे पूर्वज हैं जो हम से पहले विदा हुए है हमारा कर्तव्य कि हम उनके लिए प्रार्थना करें दिलों में बसते कुछ ही मगर छाप अनेकों कि भीतर लिए चलो हम अपना कर्तव्य पालन करें पूर्वजों की मुक्ति का संकल्प करें याद उनकी दिल में धरें ..........