मॉं

 

तेरे आँचल की छांव तले
मॉं अनेकों लाल पले
चाहे छोटे हों या बड़े
तुझको सभ ही लगते भले

ठोकर खाते, गिरते पढ़ते
घबरा जाते जब हम ढर् से
धूल भरा वो तेरा आँचल
सहला जाता मॉं हर ग़म से

अब जो हम परदेस आ बसे
गर्दिशों की धूल तज कर फँसे
याद तेरी मॉं बहुत ही सताए
जब जब घने से बादल बरसे

रहते हैं हम सहमे सहमे से

आँखों से चुपके आँसू बरसे
जब होंठ हमारे मुस्कुराए
आह सी निकल जाती है दिल से

सिकीलधी

कमाऊ लाल

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बेटा जब क़ाबिल होते ही बन जाए कमाऊ लाल,
आशाओं के पुल बन्ध जाते, होता है कुछ ऐसा हाल.
दादा दादी चाहते, सुधर वह जाए, न रखे बिखरे बाल,
बहु ब्याह कर लाए जल्दी, उनकी सेवा को तैयार .

माँ गर्व से कहे बेटा मेरा बड़ा सयाना, घर का रखेगा ख़याल
परवरिश अपनी पर सीना तानती, हो गया जब कमाऊ लाल.
कैसे कैसे स्वप्न सजाती, बेटे गिर्द कई महल बनाती,
उसका लाड़ला बना कमाऊ, आस भरे कई दीप जलाती.

अब सपूत है कुछ बड़ा बन गया, उसकी ख़ातिर पूजा करती,

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रहे सलामत आँख का तारा, उसके शुभ की कामना करती.
मंगलमय हो उसका जीवन, हाथ जोड़ भगवान से कहती,
वृद्धी उसकी होती जाए, नाम कमाए उसका कमाऊ लाल.

पिताजी भी कम ख़ुश न होते,जब हो संग कमाऊ लाल,
ज़िम्मेदारी का बोझ बँटेगा , जब हो संग कमाऊ लाल.
सिर के बल कुछ कम हो जाते, जब हो संग कमाऊ लाल,
राहत की लम्बी साँस वे लेते, जब हो संग कमाऊ लाल.

अब अपना बोझ वह तय कर लेगा, पुत्र है अब कमाऊ लाल,
एक का ख़र्चा तो कम होगा, पुत्र जो बन गया कमाऊ लाल.
बेटी के दहेज की कम हुई चिन्ता, कुछ मदद करेगा मेरा लाल,
अब पेनशन अपनी बचत बनेगी, घर में है अब कमाऊ लाल.

बहना चाहती अब के राखी पर, भैया ला देंगे महँगा हार,
और दिवाली भी अब से तो , बन जाएगी कुछ और कमाल.
अब तो भाई कमाऊ है उसका, घर को देंगे कुछ नया निखार,
नौकर भी अब तो रख लेंगे, भाई ही भर देगा उसका पघार.

मॉं ने मन ही मन कर लिया है एक अनोखा कार्यक्रम तैयार,
पत्थर पे अब हाथ हैं दुखते, जल्द ही जाएँगे हम बाज़ार .
मिक्स्र एवं जूसर लेकर, हम भी अब बनेंगे बड़े साहूकार,
पिताजी सोचते साइकल छोड़ काश ले सकता एक कार.

दादी व दादा की आशाएँ तो सरल सी थी, पर थीं तो सही,
मगर मॉं बापू व बहन ने तो बना डाला एक स्वप्न महल
कमाऊ लाल यह सोचा करता, दंड है पुत्र बन कर जन्मना,
इस भारत वर्ष में पुत्र माँगने पर मिलता है एक कमाऊ लाल.

नहीं है नाजायज़ आशा घर भर की, किन्तु क्या पूरी हो सकती,
क्या बतलाऊँ बहना को,मेरे इन चंद रुपयों से तेरी माँग तो सजेगी,
लेकिन लेना पड़ेगा क़र्ज़ा, पिताजी की ही तरह मेरी कमर भी दबेगी,
फिर भी गौरव से कहेंगे बड़ा सयाना है हमारा कमाऊ लाल।

कमाना चाहता है वह इतना, कर दिखाए कुछ ऐसा नया कमाल,

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तमन्ना सबकी पूर्ण कर पाए, दूर कर दे ग़रीबी का जंजाल
इतनी कमाई कर वह पाए की बेझिझक ख़ुद को समझे कमाऊ लाल
पिताजी को कुछ राहत दे पाए, मॉं के भी हों कुछ अच्छे हाल।

एै भगवान कुछ ऐसा कर दो, सब के सब हो जाएँ निहाल,
कमा के लाऊँ बस इतना भर, परिवार सदा रह पाए ख़ुशहाल
लोग जो कहते बेटा चाहिए केवल उनको, आओ देखो मेरा हाल,
काश मैं बेटी बन कर पैदा होता, आशाओं का न रहता बवाल।

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Mसिकीलधी

रक्षा बन्धन

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याद है बचपन की अठखेली
वो पूछना एक दूजे से पहेली
खेल खिलौने अद्भुत न्यारे
गेंद व गुड़ीयॉं प्यारे प्यारे

वो रंग भरी लम्बी पिचकारी
ग़ुबारों में जल भर होली की तैयारी
वो छत पर खेलना छुपन छुपाई
बात बात पर करना लड़ाई

याद आते हैं मेरे भैया प्यारे,
वो दिल्ली के साँझ सखारे
वो फुलझड़ी व कई पटाखे
मिल कर हम सब करते धमाके

manu kuturu

मम्मी से वो शिकायत करना
शरारत से वो चोटी खींचना
डैडी के घर में घुसते ही
शराफ़त की वो मूरत बनना

साथ उठ सुबह पढ़ाई करना
इक दूजे संग दौड़ लगाना
नानी, बुआ के घर जाना
सिंघाड़े, चाट व छली खाना

सुन्दर नगर जा मिठाई लाना
ऐसेक्स फ़ार्म से चिकन ले आना
अम्माँ के संग संगत जाना
प्रभात फेरी की मौज मचाना

कहॉं लुप्त हो गए वो दिन
उम्र के बहाव में बह गए वो दिन
हम भाई बहन की दूर हुई मंज़िल
जीना सीख लिया एक दूजे बिन

आज रक्षा बन्धन के पावन दिन
रीटा माँगे दिल से दुआ
मनु,मनोज, आशीष, सुधीर,
चनदर, लाल सदा रहो प्रसन्न

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दूजे भी मेरे भ्राता गण
सोनी, मुकेश, हरीश, सोनू,
महेश, दीपक व कमल
आज है पर्व तुम्हारा भैया
तुम जीयो हज़ारों वर्ष तक
हम सब बहनों की है दुआ

सिकीलधी
18/8/15

राखी वाला लचीला धागा

राखी वाला आया त्यौहार
घर में ज्यूँ आ गई हो बहार
बहन फुदकती भाई के गिर्द
सजाती थाली लिए स्नेह बिंदु

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लाती राखी वाला लचीला धागा
चन्दन टीका, कुमकुम वाला सुहागा
अक्षत भी माथे पर भैया के लगाती
दीप जला मन उज्जवल करती

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आरती रक्षक भ्राता की उतारती
उसकी लम्बी आयु की कामना करती
भाई का हित ह्रदय भीतर धर
मंगल धुन होंठों पर गाकर

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बाँधती वह राखी वाला लचीला धागा
भाई की कलाई खिल उठती सौ भागा
भैया की मनमोहक मुसकान जी को भाती
जब उसके चहेते मिषठान का निवाला लाती

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गद गद मन होता, अपने हाथों उसे खिलाती
राखी वाले लचीले धागे पर बलिहारी जाती
बन्धु उसका सखा सा भैया
जिसके संग बही जीवन नैया

दुलारता व अपना प्यार जताता
राखी वाली कलाई गर्व से निहारता
बहन चाहे छोटी हो या बड़ी
उसकी रक्षा का प्रण कर जाता
उसकी सुरक्षा का वचन निभाता

वर्ष दर वर्ष यह वचन दोहराता
बहना के चरण स्पर्श करके वह
देवी स्वरूप समक्ष शीश झुकाता

अजब यह रिश्ता बनाया हे ईश्वर
जिस पर स्वयं तू भी गौरव है करता
एक कच्चे से लचीले धागे से
स्नेह भरा अम्बार सा टपके

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मधुरता रिश्तों की बहुत निराली
भाई बहन की सदा रहे ख़ुशहाली
बहन के चोंचले, भाई की तकरार
सौग़ात का माँगना वह हर बार

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कभी वह रूठना और कभी मान जाना
ग़ुस्सा भूल एक दूजे संग अपनापन जताना
गले वो मिलना, रक्षा बन्धन मनाना
इसी को तो कहते हैं प्यार से प्यार निभाना ।।
सिकीलधी