सभ्यता

सभ्य समाज भी कभी कभी बहुत असभ्य व्यवहार कर जाता है। कैसे ?

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A BEGGAR OF FAITH!

A tale of a conversion from one faith to another without having known well what lies in one's religion by birth is becoming a common occurrence as one looks for shortcuts to life.

माँ है तो , मैं हूँ… 2 (माँ… अम्मा… Mother)

Words emerge aplenty yet words fail the magnanimity of a Mother.
Read on this poet’s expression….

यज्ञ

Part … 1

स्पंदन सांसों का तुम से ही
धमनी शिराओं में
रक्त का प्रवाह तुम से ही
जिस परमेश्वर को नहीं देखा
वो आस्था तुम से ही ।।

ये संभले हुए मेरे कदम
माँ, तुम से ही ।।
मेरा रुप, रंग, ये कद शरीर
सब, माँ तुम से ही ।।
मेरे मुख का पहला शब्द
माँ तुमसे ही हो
मेरा आचरण, व्यवहार, ये संस्कार
सब , माँ तुम से ही ।।

तुमने जाया है तो मैं हूँ
तुमने जाया और पिता का पहचान दी है
धूप छाओं, वर्षा शीत का पहचान दी है
तेरे ममता ने, तेरे आँचल ने
हर रोग दोष से रक्षा की है
अच्छे बुरे की सिख दी है ।।

माँ, तुम ही कहानी हो
तुम ही लोरी हो
मेरे ईश्वर, मेरे परमेश्वर तुम हो
मेरे गुरु, गुरुवेश्वर तुम ही हो ।।

तुम ही काव्य कविता
गद्य पद्य, सब तुम ही हो
तुम ही दोहा लोरा…

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THE LUNAR HINDUISM

Hindu Almanac is widely based on the Lunar cycle but varies somewhat at the regional level. However various phases of the moon bring in different depictions of spiritual practices following a astrological charts. This poem is a small effort at showing how much the Hindu religion rely's on the Lunar pattern.