सरमाया

उजाला करने वाले को देकर अपनी छाया वह नादान समझ बैठा ख़ुद को सरमाया बना कर बुत भगवान का मन्दिर के लिए वह अन्जान ख़ुद को समझ बैठा विधाता सिकीलधी

ईंसानियत

सो गई इंसानियत, दिन में रात हो गई  बेदर्दी की आज एक नई दास्तान हो गई खिन्न हुआ मन, हरकतों से बू आने लगी  घिनौनी शरारत एक, किसी की जान ले गई  जाग उठी हैवानियत, इब्तिदा अब हो गई  क्रूरता इतनी की, जी मिचलाने की हालत हो गई  दूजे को कहते हैं जानवर, पशुत्व प्रकीर्ति हो गई  तुमसे भले तो पशु, दुख … Continue reading ईंसानियत

यादों की चादर

ओड़ ली मॉं आज फिर तेरी यादों की चादर तुझे याद करआज दिल हुआ जाए बेकल तुम थी तो दुनिया का अंदाज़ अलग था तुम्हारे जाने से, रिश्तों का फीका सा रंग था याद आती हैं बातें वह बचपन वाली सुहानी कितनी ही रातों में सुनी हमने तुमसे कहानी ख़ुद पढ़ी लिखी न हो कर भी, हम … Continue reading यादों की चादर

धरती मॉं

हम धरती पे जन्मे धरती पर ही बोझ बने और फिर धरती में ही समाए धरती हमें प्यार से बुलाए अपनी आग़ोश में लेती सुलाए प्रियजन चाहे रहते रोते रुलाए उनको यह बात कौन समझाए जिसे जानते पीड़ित असहाय और भरते सिसकीयों भरी हाय उनका अपना अब लौट कर धरती मॉं की गोद में सो … Continue reading धरती मॉं

आओ मैय्या

छाया है आज एक सन्नाटा मानव बैठा पहनकर मुख्खौटा भयभीत हुए सभी जनगण सूना सा दिखता हर प्रांगण नहीं यह पहली बार हुआ है काल का सुदर्शन चक्र चला है महामारी ने किया आतंकित विश्व का हर जन हुआ सीमित याद करो मॉं जब उपद्रव मचा था महिषासुर का तुम ने वध किया था दानव दैत्य … Continue reading आओ मैय्या

आवारा पन्ने

शायद वह नब्ज़ दर्द देने वाली

किसी ग़ैर की पकड़ में आ गई होगी

ज़िक्र छेड़कर मेरे इतिहास के पन्नों का

उसे कुछ मज़ा शायद आया होगा