ये शरीर भी क्या शरीर ये शरीर भी कैसा शरीर कभी बना दर्द की दुकान कभी बनता दवा की दुकान इस के क्या गुण, क्या अवगुण कभी बनता सम्मान का मकान भुलेखे में डाल ह्रदय को ये बन जाता अहंकार का सामान छिड़ जाता सह मान अपमान इसको भाता खुद अपना गुणगान ये शरीर भी क्या शरीर ये शरीर भी कैसा शरीर सिकीलधी
Shayari
Hichhki हिचकी
पंछी
A bird in my balcony
बादल
मोह पाश
आजकल का समां
दूरी – 2
लौट आएँगे फिर वह सुहाने बहारों के दिन.......
सरमाया
उजाला करने वाले को देकर अपनी छाया वह नादान समझ बैठा ख़ुद को सरमाया बना कर बुत भगवान का मन्दिर के लिए वह अन्जान ख़ुद को समझ बैठा विधाता सिकीलधी
Two liner – 2
Baat niharey panchhi albela, bhor gayi aayee saanjh ki vela, Tanhai main udan raas na aaye, preetam sang lagta hai mela Sikiladi