ये शरीर!

ये शरीर भी क्या शरीर ये शरीर भी कैसा शरीर कभी बना दर्द की दुकान कभी बनता दवा की दुकान इस के क्या गुण, क्या अवगुण कभी बनता सम्मान का मकान भुलेखे में डाल ह्रदय को ये बन जाता अहंकार का सामान छिड़ जाता सह मान अपमान इसको भाता खुद अपना गुणगान ये शरीर भी क्या शरीर ये शरीर भी कैसा शरीर सिकीलधी

सरमाया

उजाला करने वाले को देकर अपनी छाया वह नादान समझ बैठा ख़ुद को सरमाया बना कर बुत भगवान का मन्दिर के लिए वह अन्जान ख़ुद को समझ बैठा विधाता सिकीलधी