उसने कहा देख कर तुम्हें याद आती है तुम्हारी माँ की और मैं फूली न समाई ह्रदय कुछ गद गद सा हुआ मामीजी भी बोली मुझे देख तुम तो साक्षात अपनी मॉं दिखती हो मन ही मन प्रसन्नता जागी और मैं इतराई खुद पर आईना जो देखती हूँ जाकर झलक उसकी ही सामने आती है वह मॉं जो छोड़ चली जहाँ को अपनी ही सूरत में ख़ूबसूरती बन पनपती है उसकी सूरत बनी मेरा अभिमान व अनजाना अनकहा स्वाभिमान उसकी सूरत से ही मिलती मुझे पहचान वर्ना शायद मेरी हस्ती रह जाती बेनाम सिकीलधी
Hindi
संस्कार Sanskar
संस्कार वे कहते हैं कुछ सुना दो अपने संस्कारों की कथा सोच में पड़ गई यकायक, मन में जागी एक व्यथा कुछ ग्लानि, कुछ मंद मुस्कान दोनों का अहसास हुआ चलो सुनाती हूँ सबको, दूर कर अब अपनी यह दुविधा पहले पले थे कुछ हम, अपने बुजुर्गों के मत पर राह चुनी उनके सिखलाए हुए संस्कारों के पथ पर मगर परिवर्तन को संसार का नियम मान कर अब चलते हैं हम अपने ही बच्चों की चुनी राह पर भूल गई कब, कैसे जग में उपजी यह नई प्रथा बड़ों का कहना मानते, छोटों को मानने की मिली सदा जी जी करते,खुशामद कर अब हम सब जीते हैं अपनी ही औलाद के आगे हम नतमस्तक रहते हैं मॉं ने सिखाया था, भोजन पकाते हुए न चखते है उसको स्वच्छता पूर्वक पहले ईश्वर को अर्पित करते हैं मगर बच्चों के नख़रों से हम इतना डर जाते हैं पकाते हुए, परोसते हुए, हम पहले चख कर देखते हैं पिता ने सिखाया था, बेवजह के खर्चे न करने चाहिए जितने की हो आवश्यकता, उतना ही उपयोग में लाइये परन्तु अब एक नया समाज है, जहां होड़ करना एक अदा है दिखावे का जीवन, बे सिर पैर लालच वाली सभ्यता है दादी के सिखलाए संस्कारों की ओट लिए हम बड़े हुए सुबह सवेरे जल्दी उठ कर, हर दिन पहले नहाए धोए प्रभु का व अपने बड़ों का आशीर्वाद ले निवाला ग्रहण किया और अपनी औलाद को दिन चढ़े तक सोने का संस्कार दिया रात को जल्दी सोते थे, तो ऑंख ब्रह्म पहर खुल जाती थी अब हम देर रात तक टीवी देख, या फिर पार्टी कर थकते हैं सुबह को भजन कीर्तन समय का दुरुपयोग सा लगता है हम बच्चों के आलस में रंग, अपनी दिनचर्या बदलते हैं मगर इस बदलाव में एक ताज़ा कशिश सी भी दिखती है अब हम भी सोशल मीडिया पर, अपने गुणगान करते हैं न किया बखान कभी जिस मॉं के हाथों बने पकवानों का आज उसके सिखाए व्यंजन पका, हम इतराया करते हैं चाचा, मामा, बुआ व फूफा अब सब पराए लगते हैं मगर अपने जने इन बच्चों पर हम जान क़ुर्बान करते हैं सुबह से शाम, हर दिन बस उनकी ही दिनचर्या का ध्यान घर जो पहले घर लगते थे, अब बन गए हैं मकान नन्हे मुन्नों की मुस्कान पर बलिहारी लेने की गई आदत अब तो बस उनकी हर अदा की फ़ोटो लेने की मिली तबियत कितनी ख़ुशी मिलती है जब हम नया स्टेट्स बदलते हैं अपने जीवन की कोई झलक, बेझिझक प्रकट करते हैं दूर देश बैठ अब हम अपनों से वर्चुअल ही मिल जाते हैं क्योंकि छुट्टियों के दिनों में तो हम बच्चों संग घूमने जाते हैं यह नई संस्कृति हम में एक नयापन संचारित करती है अब साठ के हो, हम बूढ़े नहीं, मदमस्त जवाँ से दिखते हैं कल हमें केवल अपने आदरणीय जन ने था सिखलाया मगर आज हमने अपने भविष्य को नया साकार दिया हमें कोई शर्म महसूस न होती जब बच्चे सिखलाते हमें उनकी ज्ञानवर्धक बातों ने हमारी सोच को नया आकार दिया संस्कार कोई हो, उतना भी बुरा कभी न होता है हमारा अपना दृष्टिकोण ही, हमारी सभ्यता बनता है न करें बुराई किसी की, अपनी सच्चाई में संतुष्ट रहें बस यही गुण अपना कर, न किसी जीव की हत्या करें आज आप हम जैसे भी हैं,प्रसन्न चित्त हो कर जीएँ मान सम्मान बड़ों छोटों का, आदर सहित एक सा करें … Continue reading संस्कार Sanskar
उनके बलिदान
मेरी सखी
प्यारी बिन्दू कल रात तुम आई सपने में मेरेमेरे ह्रदय के थे खिल उठे कपोलेतुम्हारे बालों में कान के पीछे वह फूलजामुनी और नारंगी वह फूलकितनी सुन्दर दिख रही थी तुमहम दोनों ने बाँहों में बाँहें पकड़बहुत देर तक एक साथ डाँस कियाडेरों बातों का ख़ज़ाना था खोलाऔर सब से अच्छी बात यह थीकि … Continue reading मेरी सखी
वर्ल्ड पेरेन्ट्स डे
वो मना रहे वर्ल्ड पेरन्ट्स डे कहते करो आदर मॉं पिता का नहीं जानते दुनिया के कुछ लोग अपनी सभ्यता रख कर कायम प्रतिदिन देते आदर माता पिता को उनके कर चरण स्पर्श करते दिन का आरम्भ रखते उनको स्वयं संग सदा कर सकते अपने बचपन की भरपाई न मगर करते परवरिश उनकी जी जान … Continue reading वर्ल्ड पेरेन्ट्स डे
वो गुज़र गया
कल शाम सोशल मीडिया पर देखा एक चेहरा, जिसको देख अचानक दिल का एक सोया हिस्सा धड़का वह उस का चेहरा था… वर्षों बाद यकायक उस तस्वीर को देख एक चलचित्र की तरह बहुत कुछ…. जाने क्यों मस्तिष्क भीतर घूमने लगा शोक समाचार था…. वो गुज़र चला था, अलविदा कर गया था कई घिनौनी यादें फिर लौट आईं थीं समझ ही न आया कैसा बर्ताव करूँ राहत की साँस लूँ या शोक मनाऊँ कहते हैं जाने वाले के बारे में अच्छा ही बोलो मगर, यह मन है कि बग़ावत सी करता है वह मेरा अपना नहीं था, बिलकुल नहीं था मगर इतना ग़ैर भी तो नहीं था आख़िर वही तो था…. जिसने मेरे कोमल जिस्म को कुरेदा था उसकी घिनौनी हरकतों कि जानिब मेरा बचपन महफ़ूज़ ही न था उसका नाम सुनते ही बेस्वाद ख़्याल आते है नफ़रत की है उससे बड़े जी जान से फिर उसके मौत की ख़बर जाने क्यों उसकी आत्मा के सुखी होने की दुआ माँगती है दिमाग़ की जद्दोजहद ने किया बेक़ाबू एक बार फिर महसूस हुई … मुझे मेरे ही जिस्म से उसकी बदबू क्या ये सोचना कोई पाप है अच्छा हुआ कि वो गुज़र गया सिकीलधी
Khushboo Bahar Ki! / Spring Fragrance !
This post is a tribute to the Late His Holiness Baba Hardev Singh Ji. Spring Fragrance! People remain as they are They stay merely as people But, some special ones leave their mark on the Earth Such a person emits The fragrance of spring Those people make the world A fragrant place Bababji, you were … Continue reading Khushboo Bahar Ki! / Spring Fragrance !
मुखौटा
प्रेम से रहो!
https://videopress.com/v/CM74pns4?resizeToParent=true&cover=true&preloadContent=metadata&useAverageColor=true जीना है जब तक. क्यों न करे मोहब्बत ! रखें भाई चारा, न लें किसी की तोहमत! यादों की छोड़ छाप जहां में, ख़ुशनुमा करें खुद की क़िस्मत! आपसी नाता निभाएं , ईश्वर की मान नेमत! सिकीलधी
Guru Tuhi Tu!
A Tribute to Baba Hardev Singh Ji