संस्कारों से सम्बंध

संस्कार वे हैं जिनसे हमारी सभ्यता का निर्माण होता है!

संस्कार वे हैं जिनसे हमारी परवरिश का निर्माण होता है!

संस्कार वे हैं जिनसे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है!

संस्कार वे हैं जिनसे मनुष्य की अंतर आत्मा उच्चतम मानी जाती है!

संस्कार वे हैं जिनसे हमारा शरीर धरती का होकर भी आत्मिक रूप से दैविक प्रकृति का रहता है

भारतीय सभ्यता के अनुसार हमारे लिए सोलह संस्कार की नियती है। मानव जीवन के जन्म से मृत्यु का सफ़र इन सोलह संस्कारों से सुशोभित माना जाता है हालाँकि आज की नई पीढ़ी संस्कारों की बली चढ़ाने में सक्षम होती दिख रही है।

वेदों द्वारा सिखलाए ये सोलह संस्कार हमारे पूर्वजों ने तो पूर्णता निभाए होंगे परन्तु मेरे जैसे कई होंगे जिनके लिए वैदिक संस्कारों कि तुलना में पारिवारिक व सांसारिक संस्कार अधिक महत्व रखते हैं। ये वे संस्कार हैं जिनसे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है, जो हमारी परवरिश का अभिन्न अंग बन जाते हैं। 

क्योंकि बात यहाँ अपनी विचारधारा के प्रस्तुतीकरण  की है तो अपनी ही बताने का प्रयास करती हूँ ।

हम भारतीय लोगों के लिए बच्चों की परवरिश बहुत मायने रखती है क्योंकि उसी परवरिश से उनके संस्कारों की नींव पड़ती है। बचपन मेंही मिले नैतिक संस्कार जीवन के हर मोड़ पर जीव के सहाई व मार्ग दर्शक बन जाते हैं। 

जन्म से मृत्यु तक की राह पर हर नए मोड़ पर कोई न कोई संस्कार हमारा साथी बनता है। गर्भ में पल रहे शिशु पर गर्भाधान संस्कार का कितना असर होता है, ये बताने के लिए हमें ऋिशी विज्ञान की आवश्क्ता नहीं है। मेरी मॉं बताया करती थी कि जब मेरे बड़े भैय्या उनकी कोख में पल रहे थे तो उन्होंने प्रतिदिन श्री भागवत पुराण का अध्ययन किया था। बड़े भैया हम सब भाई बहनों से अधिक धैर्यवान, शांतस्वभाव के व सुलझी सोच वाले व्यक्तित्व के मालिक हैं। 

इसी प्रकार मेरे अपने बच्चों पर भी मैं ने गर्भ से जुड़े उनके संस्कारों की झलक देखी है। 

ऐसा माना जाता है कि हमारी सन्तान हमें ईश्वर का दिया उपहार होती है एवं हमारे पूर्व करमों के अनुसार प्राप्त होती है। मनु साहित्य केअनुसार हर प्राणी अपनी सन्तान द्वारा अपना पुनर निर्माण करता है । शायद इसीलिए हमारे जीवन में जो कमी रह जाती है हम अपनी सन्तान के माध्यम से परा करना चाहते हैं।

कुछ वाक्यांश अपने जीवन के पन्नों से

बचपन से ही घर में दादी एवं अपने पिताजी को दान व पुण्य करम करते देखा। जाने अन्जाने वह संस्कार कब मेरे मन में बस गए, पता हीन चला। कभी सचेत तरीक़े से इस पर विचार नहीं किया।फिर जब बच्चे बड़े हो कर अपनी इच्छानुसार धर्म कर्म के कार्य करते दिख जातेतो कुछ आश्चर्य सा हुआ। पूछने पर बोले में तुम्हीं से तो सीखा है यह सब। अब मुड़ कर देखती हूँ और ख़ुद को टटोलती हूँ तो जीवनदर्पण के समक्ष वे अनाथालयों , वे वृद्धाश्रमों , व झुग्गी झोंपड़ियों कि ओर गए क़दम यकायक सामने आते हैं।ये ही तो हैं संस्कार जिनसे बढ़ता जीवन का मान व शान।

बिटीया के ओ लेवल की परीक्षा का नतीजा निकला था। वह उत्तीर्ण अंकों से इतनी सफल हुई थी, जिसकी आशा न उसने, न हम ने की थी। मगर जब नतीजा निकला था तो वह कोइम्बटूर में पढ़ने को जा चुकी थी। उसको जब फ़ोन करके उसके इम्तिहान का नतीजा सुनाया तो उसे मानों यक़ीन ही न हुआ। मगर अगले ही क्षण बोली, यह ईश्वर की देन है इसलिए आज अपने स्कूल की संध्या आरती तो मैं ही करूँगी । यह सुनकर मेरी आँखें ख़ुशी से भर आईं व उसके गुरू स्वामी स्वरूपानन्द जी की सिखलाई पर गर्व भी हुआ। उसने न कोई उपहार माँगा,न ही ख़ुद पर इतराई : उसने तो ईश्वर का उपकार जताया। इतनी अधेड़ व चंचल सी आयु में इतना संतुलन उसका संस्कार ही तो था।

एक दोपहर मैं नैरोबी स्थित एक माल में गई। उसी माल में बड़ी बिटिया का दुकान भी था। उससे मिलने मैं वहाँ गई परन्तु वह वहाँ न मिली। पूछने पर उसके कर्मचारियों ने ऊपरी मंज़िल स्थित सिनेमा घर कि ओर जाने को कहा । वहाँ जाकर जो दृश्य देखा उससे मैं अचंभित रह गई।वहाँ अनाथालय से आए बच्चों के बीच बैठी मेरी बिटिया जाने कब उन ५८ बच्चों की मॉं बन चुकी थी। हर बच्चे के हाथ में सैंडविच, सोडा व पॉपकॉर्न 🍿 था व फ़िल्म देखने को उत्सुक थे। अनाथालय के शिक्षक से पता चला कि बिटिया पिछले कुछ वर्षों से उस अनाथालय कि अदृश्य रूप से देखरेख करती आई थी। जब बेटी से पूछा तो वह बोली, मॉं इसमें बताने वाली कोई बात ही नहीं है “।उस एक क्षण में यूँ लगा जैसे मेरी स्वर्गीय दानवीर दादीजी मेरे समक्ष खड़ी हो ।

बेटा जब केवल १५ वर्ष का था तो किसी कारणवश उसको परदेस किसी बोर्डिंग स्कूल में भेजना पड़ा । पहले पहल तो वह घबराया और विदेशी लड़कों के बीच खुद को हीन जानने लगा । ऐसे में उसको हम ने याद दिलाया की ईश्वर सदैव उसके संग हैं और उसने हनुमान जी का सहारा लिया । बचपन से सिखाया हुआ हनुमान चालीसा जी का पाठ उसके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका था । केवल एक माह पश्चात वही लड़के जो कभी उसका उपहास करते थे, अब हर दिन उसके साथ हनुमान चालीसा जी का पाठ करने लगे। उसके संस्कारों की जीत हुई थी ।

सभ्यता व संस्कार :

संस्कारों का हमारी सभ्यता से एक अनकहा सा नाता है।हमारे जीवन में कुछ एक ऐसे सात्विक तत्व हमारी दिनचर्या से जुड़े हैं जिनसे हमारी संस्कृति व सभ्यता की झलक मिलती है।

सुबह सवेरे उठ कर, स्वच्छ हो,पूजा करना।

बढ़ों के चरण स्पर्श कर उन्हें आदर देना, छोटों को आशीष भरा दुलार देना।

जानवर, जीव जन्तु इन सब को सृष्टि के रचयिता का वरदान मानना भी हमारे संस्कारों में ही गिना जाता है।

हमारे संस्कार ही हमें गाय को माता तुल्य, नाग को देव तुल्य, पेड़ों को आदर्नीय , जल को पवित्रा का प्रतीक, अग्नि को पूजनीय, आकाश को अविस्मरणीय एवं वायुको शक्ति स्त्रोत मानना व जानना सिखलाते हैं। 

मनु समि्हत ज्ञान समझाता है कि जहॉं स्त्री का आदर होता है वहॉं देव भी प्रसन्न होते हैं किन्तु जहॉं स्त्री का निरादर होता है, वहॉं कई प्रकार के जप, तप, पूजा, आहुति व्यर्थ व निष्फल हो जाते हैं।कुछ ऐसे ही संस्कार हमारी सोच पर प्रभाव रखते हैं । तभी तो हम कन्या पूजन करते हैं, गृहणी को लक्ष्मी स्वरूप व मॉं को अपना संसार मानते हैं। 

हमारे संस्कार जीवन पश्चात भी हम से जुड़े रहते हैं। अन्त्येष्टि के समय मृतक शरीर को नहला, स्वच्छता व आदर पूर्वक वस्त्र, आभूषण, अलंकार व मंत्रोचारण सहित विदाई दी जाती है।ये हमारे संस्कार ही हैं जो जन्म की रस्में, यज्ञोपवीत की रस्में, विवाह की रस्में व देहांत की रस्में सब परिवार व बंधू बाँधवों के समक्ष करने को आवश्यक मानता है।

आज समय ने परिवर्तन अवश्य सिखाया है

जिसकी छाया तले कुछ संस्कारों पे धुँधला साया है

 मगर हम सभ्यता की डोर को थाम चलें तो

कैसे बहक गए यह पहचान सकें तो

माया के दर्पण की छवि को बदलें

हमारा हर संस्कार हमारे कण कण में समाया है

वह नन्हा बालक जो दिन प्रतिदिन माता पिता को तुलसी पर आदर सहित जल चढ़ाते देख बड़ा होता है, वह भला पेड़ पौधों का महत्व कैसे न जानेगा।

वह नन्ही बालिका जो मॉं को कौअे व कुत्ते को रोटी देते देख बड़ी होती है, वह कैसे न जानेगी पशु पक्षियों का मान करना।

वह बिटीया जो घर भर का दुलार पाकर, देवी सम्मान पूजी जाती हो, वह कैसे न समझेगी दूसरों का सत्कार करना।

आज हम संस्कारों के लुप्त होने का रोना रोते है, मगर अपने भीतर झॉंक कर देखेंगे तो जान पायेंगे कैसे हम ने स्वयं ही संस्कारों को पश्चिमी सभ्यता की चादर तले ढाँक कर घूँघट बंद रखा है। आवश्यकता है तो केवल स्वयं को टटोलने की, स्वयं को स्वयं का प्रतिबिंब दिखलाने की।

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