संस्कार Sanskar

संस्कार  वे कहते हैं कुछ सुना दो अपने संस्कारों की कथा सोच में पड़ गई यकायक, मन में जागी एक व्यथा  कुछ ग्लानि, कुछ मंद मुस्कान दोनों का अहसास हुआ  चलो सुनाती हूँ सबको, दूर कर अब अपनी यह दुविधा  पहले पले थे कुछ हम, अपने बुजुर्गों के मत पर राह चुनी उनके सिखलाए हुए संस्कारों के पथ पर मगर परिवर्तन को संसार का नियम मान कर अब चलते हैं हम अपने ही बच्चों की चुनी राह पर भूल गई कब, कैसे जग में उपजी यह नई प्रथा  बड़ों का कहना मानते, छोटों को मानने की मिली सदा जी जी करते,खुशामद कर अब हम सब जीते हैं  अपनी ही औलाद के आगे हम नतमस्तक रहते हैं  मॉं ने सिखाया था, भोजन पकाते हुए न चखते है  उसको स्वच्छता पूर्वक पहले ईश्वर को अर्पित करते हैं  मगर बच्चों के नख़रों से हम इतना डर जाते हैं  पकाते हुए, परोसते हुए, हम पहले चख कर देखते हैं  पिता ने सिखाया था, बेवजह के खर्चे न करने चाहिए  जितने की हो आवश्यकता, उतना ही उपयोग में लाइये  परन्तु अब एक नया समाज है, जहां होड़ करना एक अदा है दिखावे का जीवन, बे सिर पैर लालच वाली सभ्यता है  दादी के सिखलाए संस्कारों की ओट लिए हम बड़े हुए सुबह सवेरे जल्दी उठ कर, हर दिन पहले नहाए धोए प्रभु का व अपने बड़ों का आशीर्वाद ले निवाला ग्रहण किया और अपनी औलाद को दिन चढ़े तक सोने का संस्कार दिया  रात को जल्दी सोते थे, तो ऑंख ब्रह्म पहर खुल जाती थी  अब हम देर रात तक टीवी देख, या फिर पार्टी कर थकते हैं  सुबह को भजन कीर्तन समय का दुरुपयोग सा लगता है  हम बच्चों के आलस में रंग, अपनी दिनचर्या बदलते हैं  मगर इस बदलाव में एक ताज़ा कशिश सी भी दिखती है  अब हम भी सोशल मीडिया पर, अपने गुणगान करते हैं  न किया बखान कभी जिस मॉं के हाथों बने पकवानों का आज उसके सिखाए व्यंजन पका, हम इतराया करते हैं  चाचा, मामा, बुआ व फूफा अब सब पराए लगते हैं  मगर अपने जने इन बच्चों पर हम जान क़ुर्बान करते हैं  सुबह से शाम, हर दिन बस उनकी ही दिनचर्या का ध्यान  घर जो पहले घर लगते थे, अब बन गए हैं मकान  नन्हे मुन्नों की मुस्कान पर बलिहारी लेने की गई आदत अब तो बस उनकी हर अदा की फ़ोटो लेने की मिली तबियत  कितनी ख़ुशी मिलती है जब हम नया स्टेट्स बदलते हैं  अपने जीवन की कोई झलक, बेझिझक प्रकट करते हैं  दूर देश बैठ अब हम अपनों से वर्चुअल ही मिल जाते हैं  क्योंकि छुट्टियों के दिनों में तो हम बच्चों संग घूमने जाते हैं  यह नई संस्कृति हम में एक नयापन संचारित करती है  अब साठ के हो, हम बूढ़े नहीं, मदमस्त जवाँ से दिखते हैं  कल हमें केवल अपने आदरणीय जन ने था सिखलाया  मगर आज हमने अपने भविष्य को नया साकार दिया  हमें कोई शर्म महसूस न होती जब बच्चे सिखलाते हमें  उनकी ज्ञानवर्धक बातों ने हमारी सोच को नया आकार दिया  संस्कार कोई हो, उतना भी बुरा कभी न होता है  हमारा अपना दृष्टिकोण ही, हमारी सभ्यता बनता है  न करें बुराई किसी की, अपनी सच्चाई में संतुष्ट रहें  बस यही गुण अपना कर, न किसी जीव की हत्या करें आज आप हम जैसे भी हैं,प्रसन्न चित्त हो कर जीएँ  मान सम्मान बड़ों छोटों का, आदर सहित एक सा करें  … Continue reading संस्कार Sanskar

वर्ल्ड पेरेन्ट्स डे

वो मना रहे वर्ल्ड पेरन्ट्स डे कहते करो आदर मॉं पिता का नहीं जानते दुनिया के कुछ लोग अपनी सभ्यता रख कर कायम प्रतिदिन देते आदर माता पिता को उनके कर चरण स्पर्श करते दिन का आरम्भ रखते उनको स्वयं संग सदा कर सकते अपने बचपन की भरपाई न मगर करते परवरिश उनकी जी जान … Continue reading वर्ल्ड पेरेन्ट्स डे

Only One Earth!

https://anchor.fm/sikiladim/episodes/Only-One-Earth-e1jg95r Published in The Asian Weekly, Edition 613,( 3rd to 9th June,2022) to mark World Environment Day The world is coming to a standstillOur Ecosystem on degradation sillAwaken, arise all in togethernessGive the environment an upscale bill We have tasks aplenty to accomplishTo make our surroundings flourishLet’s conserve the Earth habitatBy not being greedy & … Continue reading Only One Earth!

उसकी आँखें / Uski Aankhein!

https://anchor.fm/sikiladim/episodes/Uski-Aankhein-e1jg95q उसकी आँखें उसकी आँखें कुछ ख़ामोश  कुछ नम उसके अपनों ने ही शायद ढाया सितम  जाने अनजाने में ही सही, उसने ओढ़ ईश्वरीय चोला इच्छा पूर्ति की परिवार जनों की  अपनी तमन्नाओं को रख ताला बन्द  वह पाँच लाख वाला महँगा लहंगा  बिटिया को दिलाना  जिसके बोझ तले निकला सा जाए है दम वह बहुरानी को नया नेकलेस  सेट दिलवाना  जिसके हीरों की दमक से आती  वाह की चमक  वह बेटे की नई कार की फ़रमाइश  माडल नया ख़रीद  उसके अलग घर का सपना पूरा कर घिस गई गर्दन  दामाद को भी चाहिए महँगी वाली घड़ी कैसे न देगा?  बेटी की कर के विदाई सोचा,अब खर्चा  कुछ तो होगा कम पोती भी बाँहों में झूल माँगती तोहफ़ा  दिखा कर अल्हड़ पन दादा तो न नहीं करेंगे, चाहे जेब में हो या न हो दम पोता भी कालेज की फ़ीस की देता दुहाई  दादा पे रख उम्मीद  बाइक का लेटेस्ट माडल है माँगता  बन गई एक और रसीद जब फादर्स डे आता , रेस्टोरेन्ट में जागर  मनाया जाता  मगर उस पिता की खुद की इच्छाओं पर किसी का ध्यान न जाता पोती पास आ खेलने से कतराती  समय न होने का बहाना बनाती पोता बूढ़े हो रहे दादा से दूर जा टेनिस व फुटबॉल का मैच देखता उसे भी अच्छा लगता, यदि उसके संग बैठ मैच वो देखता पोती से नई फ़िल्म की कहानी सुनकर शायद मन बहल जाता बेटी, बेटे व बहू से तो आशा रखी ही न जाती अकेले बैठ तन्हाई में पत्नी की याद उसे बहुत सताती उसकी ऑंखें कुछ ख़ामोश  कुछ नम जीवन में हैं देख लिए हर पल बदलते लोगों के ढंग पिताजी सुन के, पापा या डैडी सुन के … Continue reading उसकी आँखें / Uski Aankhein!