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डैडी
आजकल का समां
बादल की चादर
कपास के कपोलों सी मुलायम चादर, अनछुए आलिंगन में बाँधती यह चादर.......
आस के धागे
है कौन वह अपना जो, उलझनों को सुलझा सके, गिरह जो लग गईं हैं उनमें, उन को आ सुलझा सके.........
मौत का सेहरा
कितना शांत, कितना ठहरा, लगता था उनका चेहरा, बाबा ने हम सब से दूर हो, जब पहना था मौत का सेहरा.......
तितलीयॉं
तितलीयॉं ओढ़े सफ़ेद लिबास दो तितलियॉ करती इक दूजे से अठखेलियाँ पेड़ पतीयॉं, डाली व कलियाँ बूझ न पाती उनकी पहेलियॉं कैसी अनोखी ये दो सखियॉं करती जाने कौन सी बतियॉं कभी उड़तीं वो डाली डाली कभी थिरकतीं क्यारी क्यारी इनकी चुप्पी भरी बेआवाज़ सदाऐं जाने किस रसिया को लुभाऐं ख़ामोश दास्ताँ अपने दिल की … Continue reading तितलीयॉं
बलात्कार
सभ्यता असभ्यता जाने कैसे जाने अन्जाने रूप में हमारे ही हाथों गेंद की तरह उलझती दिखती है...........