जब अख़बार में नाम छपता है मेरा, और तस्वीरों सहित ज़िक्र होता है ! तब उन्हें भी मुझ पर गर्व होता दिखे , मेरी सफलता उन्हें अपने जीवन का अंग लगे।
मेरा सम्मान
जब अख़बार में नाम छपता है मेरा, और तस्वीरों सहित ज़िक्र होता है ! तब उन्हें भी मुझ पर गर्व होता दिखे , मेरी सफलता उन्हें अपने जीवन का अंग लगे।
छुआ उसने कुछ इस तरह आज जैसे कभी छुआ न था पहले कभी उसकी नज़रों ने छुआ बिजली की तरह और दिल के हर कोने में तरंग सी जागी उसके हाथों बीच समाया मेरा हाथ और जन्नत का हो गया अहसास वो चुम्बन गालों पर दिया लेकिन… आत्मा की गहराई को थपकी सी मिली छुआ उसने अपने प्रेम भरे शब्दों से और मैं ने गंगा सी पवित्रता महसूस की उसके आलिंगन का मीठा अहसास महका गया मेरी रूह को दे सुखद आभास छुआ उसने कुछ इस तरह से आज इतराई मैं खुद पे, जागा नया विश्वास हुई हूँ आज बहुमूल्य उसकी वजह से जिसने मुझे खुद मुझसे ही बेख़बर किया सिकीलधी
अब करे तो वह क्या करे..... अपने ही अकेलेपन में अपना सहारा बन, खुद को स्वयं ही समेटता..... अपने अतीत के बिखरे टुकड़े जोड़ता....
Ravan effigy at Shri Sanatan Dharam Sabha grounds in Nairobi: Dusshera 2022 विजय दिवस की आई दशमी राम कथा की हर घर कथनी । दस दस पाठ पढ़ कर भी पंडित न जाने जाते हो। वेदों पुराणों के ज्ञाता हो कर भी अहंकारी जाने जाते हो। स्वर्ण महल तुम्हारी लंका का भस्म कर गया वानर … Continue reading दशानन!
हे मॉं अपनी आसीस रखना भूलों को राह दिखाना मॉं सब पर अपनी कृपा बनाए रखना तेरे दर पे जो भी आए मॉं हर उस प्राणी पर महर करना मॉं तेरे भक्तों की है विनती याद रखना हमें हर गिनती सिकलधी करती है अरदास सदा रखना चरणों के पास जो कोई आए दासी दास तेरे … Continue reading माता से प्रार्थना
यह इमारतों की है बस्ती , दूर तलक ईंट पत्थर की हस्ती ! आकाश को ज्यूँ चूमने लगतीं , लम्बी इमारतों की आवारागर्दी! चाहे दिन हो गर्म या हो मौसम में सर्दी , इन लम्बी रहगुज़र में आबादी पलती! ढलती धूप को शांत सा साया, जाने कितनों के मन को भाया ! आँच दिखाकर हल्की व ठंडी, धूमिल किरनों की सरपरस्ती ! चमक बिखेर मकानों के गिर्द , जैसे स्वयं को उन पर ओढ़ती! इस बस्ती की बात ही निराली , ज्यूँ जादूगर की माया नगरी ! कारों बसों के कोलाहल संग, एक अजब सी ऊर्जा उपजी! हैडलाइटों की सारी झिलमिलाहट , बिल्डिंगों की खिड़कियों पर बरसती !
https://spotifyanchor-web.app.link/e/IUutyHemwub संस्कार वे हैं जिनसे हमारी सभ्यता का निर्माण होता है! संस्कार वे हैं जिनसे हमारी परवरिश का निर्माण होता है! संस्कार वे हैं जिनसे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है! संस्कार वे हैं जिनसे मनुष्य की अंतर आत्मा उच्चतम मानी जाती है! संस्कार वे हैं जिनसे हमारा शरीर धरती का होकर भी आत्मिक रूप से दैविक प्रकृति का रहता है भारतीय सभ्यता के अनुसार हमारे लिए सोलह संस्कार की नियती है। मानव जीवन के जन्म से मृत्यु का सफ़र इन सोलह संस्कारों से सुशोभित माना जाता है हालाँकि आज की नई पीढ़ी संस्कारों की बली चढ़ाने में सक्षम होती दिख रही है। वेदों द्वारा सिखलाए ये सोलह संस्कार हमारे पूर्वजों ने तो पूर्णता निभाए होंगे परन्तु मेरे जैसे कई होंगे जिनके लिए वैदिक संस्कारों कि तुलना में पारिवारिक व सांसारिक संस्कार अधिक महत्व रखते हैं। ये वे संस्कार हैं जिनसे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है, जो हमारी परवरिश का अभिन्न अंग बन जाते हैं। क्योंकि बात यहाँ अपनी विचारधारा के प्रस्तुतीकरण की है तो अपनी ही बताने का प्रयास करती हूँ । हम भारतीय लोगों के लिए बच्चों की परवरिश बहुत मायने रखती है क्योंकि उसी परवरिश से उनके संस्कारों की नींव पड़ती है। बचपन मेंही मिले नैतिक संस्कार जीवन के हर मोड़ पर जीव के सहाई व मार्ग दर्शक बन जाते हैं। जन्म से मृत्यु तक की राह पर हर नए मोड़ पर कोई न कोई संस्कार हमारा साथी बनता है। गर्भ में पल रहे शिशु पर गर्भाधान संस्कार का कितना असर होता है, ये बताने के लिए हमें ऋिशी विज्ञान की आवश्क्ता नहीं है। मेरी मॉं बताया करती थी कि जब मेरे बड़े भैय्या उनकी कोख में पल रहे थे तो उन्होंने प्रतिदिन श्री भागवत पुराण का अध्ययन किया था। बड़े भैया हम सब भाई बहनों से अधिक धैर्यवान, शांतस्वभाव के व सुलझी सोच वाले व्यक्तित्व के मालिक हैं। इसी प्रकार मेरे अपने बच्चों पर भी मैं ने गर्भ से जुड़े उनके संस्कारों की झलक देखी है। ऐसा माना जाता है कि हमारी सन्तान हमें ईश्वर का दिया उपहार होती है एवं हमारे पूर्व करमों के अनुसार प्राप्त होती है। मनु साहित्य केअनुसार हर प्राणी अपनी सन्तान द्वारा अपना पुनर निर्माण करता है । शायद इसीलिए हमारे जीवन में जो कमी रह जाती है हम अपनी सन्तान के माध्यम से परा करना चाहते हैं। कुछ वाक्यांश अपने जीवन के पन्नों से : बचपन से ही घर में दादी एवं अपने पिताजी को दान व पुण्य करम करते देखा। जाने अन्जाने वह संस्कार कब मेरे मन में बस गए, पता हीन चला। कभी सचेत तरीक़े से इस पर विचार नहीं किया।फिर जब बच्चे बड़े हो कर अपनी इच्छानुसार धर्म कर्म के कार्य करते दिख जातेतो कुछ आश्चर्य सा हुआ। पूछने पर बोले में तुम्हीं से तो सीखा है यह सब। अब मुड़ कर देखती हूँ और ख़ुद को टटोलती हूँ तो जीवनदर्पण के समक्ष वे अनाथालयों , वे वृद्धाश्रमों , व झुग्गी झोंपड़ियों कि ओर गए क़दम यकायक सामने आते हैं।ये ही तो हैं संस्कार जिनसे बढ़ता जीवन का मान व शान। बिटीया के ओ लेवल की परीक्षा का नतीजा निकला था। वह उत्तीर्ण अंकों से इतनी सफल हुई थी, जिसकी आशा न उसने, न हम ने की थी। मगर जब नतीजा निकला था तो वह कोइम्बटूर में पढ़ने को जा चुकी थी। उसको जब फ़ोन करके उसके इम्तिहान का नतीजा सुनाया तो उसे मानों यक़ीन ही न हुआ। मगर अगले ही क्षण बोली, यह ईश्वर की देन है इसलिए आज अपने स्कूल की संध्या आरती तो मैं ही करूँगी । यह सुनकर मेरी आँखें ख़ुशी से भर आईं व उसके गुरू स्वामी स्वरूपानन्द जी की सिखलाई पर गर्व भी हुआ। उसने न कोई उपहार माँगा,न ही ख़ुद पर इतराई : उसने तो ईश्वर का उपकार जताया। इतनी अधेड़ व चंचल सी आयु में इतना संतुलन उसका संस्कार ही तो था। एक दोपहर मैं नैरोबी स्थित एक माल में गई। उसी माल में बड़ी बिटिया का दुकान भी था। उससे मिलने … Continue reading संस्कारों से सम्बंध
उसने कहा देख कर तुम्हें याद आती है तुम्हारी माँ की और मैं फूली न समाई ह्रदय कुछ गद गद सा हुआ मामीजी भी बोली मुझे देख तुम तो साक्षात अपनी मॉं दिखती हो मन ही मन प्रसन्नता जागी और मैं इतराई खुद पर आईना जो देखती हूँ जाकर झलक उसकी ही सामने आती है वह मॉं जो छोड़ चली जहाँ को अपनी ही सूरत में ख़ूबसूरती बन पनपती है उसकी सूरत बनी मेरा अभिमान व अनजाना अनकहा स्वाभिमान उसकी सूरत से ही मिलती मुझे पहचान वर्ना शायद मेरी हस्ती रह जाती बेनाम सिकीलधी