पूछो न!

पूछो न  न पूछो तुम मुझसे  मेरे दुखों का कारण सह न सकूँगी  और तुम्हें कुछ कह न सकूँगी  बस ख़ामोश निगाहों से दर्दे दिल को बयॉं करूँगी  पाक आफ़ताब की ओढ़े आबरू  ज़मीन में ही गढ़ सी जाऊँगी  होंठ सीये भी एक अरसा हो चला लफ़्ज़ों ने कब का साथ छोड़ दिया  बस ये ऑंखें हैं जो दर्पण बन मन का कह जाती हैं जो कहना  ही न था  जी रही हूँ बोझ लिए दिल पर डरती हूँ … बाँध टूट न जाए अब सब्र का बिखर न जाए ज़ख़्मी जिगर बह न जाए नयनों से धार चुप हूँ  फिर भी कोलाहल है डर है कहीं फट ही न पड़े दुखती हर नफ़्स जो दबाए हूँ  सिकीलधी 

औपचारिकता!

अब दुनिया के दस्तूर और तकल्लुफ़ निभाने पड़ेंगे ….. ओढ़ औपचारिकता क चादर फिर एक बार…… कई पुराने रिश्ते जहां वालों से निभाने पड़ेंगे …..

अंतिम सत्य

क्या वह बन गया था मेरा सरमाया ? या फिर मेरी मौत का संदेश था लाया …. असमंजस में थी मैं …. बूझ न सकी ख़ुशी मनाऊँ या…. स्वयं अपने ही मरने का मातम मनाऊँ …..

अंतिम संस्कार

मगर वह जो चिर निद्रा सो रही….. मौत में भी आकर्षित लगती रही …. कितना सुंदर लगता है उस पर शृंगार…. जिन हाथों से कभी पहनाई थी वरमाला …… उन्हीं हाथों से अपनी पत्नी को विदाई वाली पहनाई माला

अतीत की तस्वीरें

https://spotifyanchor-web.app.link/e/neRCrixzivb आज भाभी के हाथ लगी  कुछ ऐसी तस्वीरें  जिनका रंग कुछ उखड़ा सा और किनारे फटे हुए से कुछ दरारों से ढँकी हुईं  कुछ के कोने कतरे हुए  फिर भी न जाने कैसी कशिश हुई उन तस्वीरों को देखकरsikiladi उभर आए हमारे अतीत के रंग और अतीत के भी अतीत वाली तस्वीरें  शायद हम जन्मे भी न थे  तब की हैं कुछ तस्वीरें  कुछ चेहरे ऐसे भी दिखे  जिन्हें कभी देखा ही न था और ऐसे रिश्ते नातेदार  जिनका केवल बस नाम सुना था  आज अचानक मिलने है आए अतीत का चिलमन खोलके एक दूजे से पूछने लगे हम Sikiladiयह कौन है ? वह कौन है ?  जाने अनजाने से दिखते लोग अतीत का पर्दा पलट के आए  मॉं ने सहज सम्भाले रखा था यह तस्वीरों वाला अधभुत ख़ज़ाना  घर के कई कोनों से निकला  समेट कर दराज़ों बीच छुपा सा अलमारियों में सालों से बंद  धूल से परे था, फिर भी धूल की महक लिए तहख़ानों से बाहर निकला था मॉं बाबा का यह अनमोल ख़ज़ाना  दादी तक तो हम समझे मगर परदादी को सब ने न पहचाना और फिर कई पुराने दूर दराज़ वाले रिश्तेदार जिन्का शायद कभी एक ज़िक्र सुना होगा  जब मॉं और दादी बैठ बतियातीं थीं  न जाने कितने लोगों की बातें कर जाती थीं आज वह सारे नाम पहचाने लगे मॉं चल बसी तो उसके अपने भी अब हमें हमारे अपने लगने लगे बेशक़ीमती लगतीं है अब ये तस्वीरें  जिनसे साक्षात्कार हुआ न था कभी खुद अपने बचपन के चिन्ह ढूँढने लगे अब हम अतीत के पन्नों मेंsikiladi स्वयं को ही खोजने हैं लगे  वे बचपन वाली स्टूडियो की कुर्सी पे ब्लैक एंड व्हाइट पुरानी तस्वीरें  जिन पर स्टूडियो का नाम चिन्ह था और किनारे कटांऊं कारीगरी वाले जिन्हें हम आज देख रहे व्हाट्सएैप के ज़रिए जब भाभी एक एक कर,  हर तस्वीर साझा कर रही  … Continue reading अतीत की तस्वीरें

वो यादें!

वो यादें जो सिमट तसवीरों में, मुझसे बातें करतीं हैं ...... कुछ दर्द का एहसास देतीं हैं , कुछ लबों पे मुस्कान बनती हैं........

मेरा सम्मान

जब अख़बार में नाम छपता है मेरा, और तस्वीरों सहित ज़िक्र होता है ! तब उन्हें भी मुझ पर गर्व होता दिखे , मेरी सफलता उन्हें अपने जीवन का अंग लगे।