बेटियाँ
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
कल की फुदकती बच्चियाँ सयानी हो जाती हैं
नन्हे पैरों की छन छन पायल आँगन में राग सुनाती है
छोटे छोटे हाथों से हम बड़ों को थामने लगतीं हैं
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
माँ की देखा देखी फ़ैशन थीं सीखतीं
पर्दे पीछे छुप उसकी लिपस्टिक जा लगातीं
और कोमल कली से पाँव ऊँची सी सैंडल में जा घुसातीं
ज़रा नज़र हटते ही उनसे क्या क्या कमाल करती थी
पुरानी चुन्नियॉ इकट्ठा कर, साड़ियाँ पहनती थीं
आज वही लेटैस्ट फ़ैशन के ट्रेंन्ड हमें सिखाती हैं
माँ से कहतीं न पहनें कपड़े वह तंग जो लगते बेढंग
पिनटरेस्ट पर जा उसके कपड़े बनवाती हैं
लाल नेलपालिश छुड़ा पुरानी, जेल वाली पालिश लातीं
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
आँचल पकड़ छुप्पन छिपाई करते करते
माँ को समाज में बोलने का सबक़ सिखातीं है
पोनीटेल पे फूल लगवाती, लम्बी गुतें व परान्दे बनवाते
जाने कब माँ के लिए हेयर एक्सेसरी ले आती हैं
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
काँपी कलम पकड़ना सिखाते थे जो
उन अम्मी अब्बू को कम्प्यूटर सिखा टैक सौवीं बनाती हैं
ये बेटियाँ ही तो बूढ़े दादा दादी संग बैठ
फ़ेसबुक, इन्स्टा व लेटेस्ट फ़िल्मों की झलकियाँ देतीं हैं
उँगली पकड़ जो संग थी चलतीं बाज़ार की देखने बहार
आज आंन लाइन सजा रही अपने घर संसार
पिताजी की दवाई हो या घर की सब्ज़ी तरकारी
बेझिझक आर्डर कर मँगवा लातीं, घर बैठ करतीं व्यापार
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
किया दुलार जिनका बचपन में, आज उतना सम्मान पाती है
माँ बाबा की ये लाडलीयॉ आज खुद उनकी मॉँ बन जाती हैं
दवा, दुआ, सुख दुख की साथी ये बेटीयॉं बन जाती हैं
बेबे को बिठा तसल्ली से, पापाजी की छड़ी भी बन जाती हैं
खुदा न ख़ास्ता पड़ जाए कोई बीमार अगर
इन बेटियों से ज़रा न होता सबर
कल की नन्ही सी ये कलियाँ
यकायक मदर टेरेसा भाँति बन जाती हैं
कब! जाने कब वह बड़ी हो जाती हैं
क़िस्मत वाले होते हैं वे घर
जहां बेटियाँ जन्म लेती हैं
ये ही दुर्गा, ये ही फ़ातिमा, ये ही मदर मेरी हैं
भाग खुलें परवीन आदम के
कि ज़ोया व महरीन उनकी बेटीयॉँ हैं
डाक्टर डाक्टर खेल खेलते देखो
अब डाक्टर साहिबा कहलातीं हैं
मुबारक हो, बहुत मुबारक हो तुमको ज़ोया
अब नेफ्रोलॉजी पूर्ण करके नई राह पकड़ती हो
अपने व्यवसाय को ईमानदारी से निभाना
नेक इरादे से परवाह करते , इलाज कर जाना
तकलीफ़ मिटाना दुखियारों बीमारों की तुम बिटिया
सदा सलामत रहो प्यारी बिटिया
दिल से दुआ है सिकीलधी की
I don’t understand the language but loved listening to you read.
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Thank you Mary for listening to the recording despite not knowing the language. It is a poem in praise of daughters and their caring nature. This was to celebrate a friend’s daughter who has recently become a nephrologist.
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Bahut hi achhi kavita hai… Have watched your YouTube channel and subscribed… Best wishes 👍
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Thank you for subscribing to my channel and for appreciating the poem. It encourages me to write.
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