अम्माँ का पुलाव

ईश्वर के स्वर

गरमा गरम पुलाव

स्वादिष्ट व मनमोहक

अम्मॉं अकसर हर बुध्वार, भोजन पकाती एक ही प्रकार

भरी दोपहर, गर्मी हो या सर्दी, हम करते उस भोजन को स्वीकार

गरमा गरम परोसती वह, हरे मटर के मोतियों वाला पुलाव

उसके पसंद का था वह पुलाव, यां फिर मटर का था कुछ खिंचाव

सर्दी के बहुत ही ताज़े, नरम मटर , वाह क्या ख़ास स्वाद वाले

गर्मी में शायद मिलते कुछ कम थे, पर अम्माँ को क्या थी फ़िकर

कभी सुखा कर ही रखा करती थी जाड़े के महीनों में

और कभी, फ्रीज़र में उबाल कर सहेज कर रखा करती

बनाने में शायद बहुत आसान लगता होगा वह पुलाव

देगची रख अॉंच पर, करती कुछ घी गरम।छौंक लगा कर जीरे का, करते कुछ और गरमा

प्याज़ बारीक कटा हुआ फिर डाल कर लाए गुलाबी रंग। उस महक से जाता था दिल बहक

मुट्ठी में पकड़ डालती तब कुछ हरे हरे मोती से दिखते भोले भाले प्यारे से मटर

बस तब सबर कहाँ रहा, चमची में ले डाला कुछ हल्दी , कुछ नमकघभ

हलके हाथों से चलाई वह लम्बे हैन्डल वाली स्टील की करछी, रुक रुक कर,ऑंच मध्यम पर

फिर तलब छोटे भगौने में धुले साफ़ सुथरे भीगे चावल मिलाने की थी शायद, सब के सब उँडेल दिए अन्दर

जंरा ऑंच धीमी कर, घुमाया प्यार से कुछ पल, और अचानक डेर सा पानी डाल उन्हें ढुबो ढाला यकायक

चावल अचम्भित हुए न हुए, मेरी नन्ही सी बुद्धी यह जान ही न पाई। तंग हाथ से डाले चावल, पानी डालते अम्माँ ज़रा न घबराई। क्या नल का वह जल वह मुफ़्त में थी ले पाई? कैसे बताती यह बात सखी को, हो न जाए जग हँसाई।

ख़ैर फिर कर दी ऑंच भी उत्तम, अब ज़रा मस्तिष्क पोंछने को एक पल रुक पाई। डाला ढक्कन देगची ऊपर, फिर मेज़ पर ला रखी दही जो सुबह सवेरे थी जमाई। शायद चावल भाँप गए दूर ही से दही की ठण्डी हरकत, आया उन पर ताप ज़ोरों का और लगे खौलने।मैं नादान यह समझ बैठी कि चावल को है ग़ुस्सा आया, इसीलिए उबल पड़े हैं।

ग़ुस्सा था या नहीं, किन्तु महक निकली बड़ी मनमोहक। अब तो भूख भी बहुत ज़्यादा लगने लगी ।

क़रीब जाकर देखना जो चाहा मैंने, देगची से कुछ अजब सी गुफ़्तगू मेरे नन्हें कानों तक आई। यह कैसा वार्तालाप हो रहा था देगची भीतर पक रही सामग्री के बीच? उत्सुकता व भूख दोनों अब एक सम्मान ललचा रहे थे। मन में मेरे कई सवाल जागरित हुए जा रहे थे।

जो बात तब न जान सकी, न समझ सकी, आज फिर अम्माँ वाला पुलाव बना कर अभी अभी है समझ में आया।भोजन न केवल है पकाया जाता, बहुत ज्ञान वर्धक होता है यह अन्न दाता। अब साझा करती हूँ तुमसे , अम्मॉ वाले पुलाव की वार्ता।

जब खौल के पानी कुछ शांत हुआ था, ऑंच पे हल्की लौ में पुलाव सिझा था

चावल ने मनचले अन्दाज़ में अपनी अहमियत का अहसास दिया था।

“मैं हू श्रेष्ठ, प्रथम तुम सब में। श्वेत वर्ण मैं सबसे सुन्दर, मैं ही भरता सबका पेट।

मैं ही सत्य,मैं ही उज्जवल, मेरी तो हर बात है विशेष।”

हल्दी मुस्काई, लेती अँगड़ाई , चावल के थी अंग अंग पे समाई

“काहे करते हो इतना ग़ुरूर हे अक्षत, रंग ढाला तुम्हे मेरे रंग में ऐ बॉवरे।

मेरे रंग जो रंग है जाता, मुझे बनाता अपना दाता, मेरी पनाह में केसरिया हो लुभाता।

मैं हूँ उत्तम, मैं हूँ धर्म जो जिस पर चढ़ जाता, वह मुझमें समाता। इसी तरह मैं अपना कर्तव्य निभाता”

बस तब क्या था। बेचैन हुए जा रहे मटर भी बोले, गोल घुमा कर वचन वह बोले,

“ मटर का पुलाव क्या होगा बिन मेरे? मैं ही इस पुलाव की सारी जान हूँ ।

मैं अत्याधिक आकर्षक, मैं स्वाद वंदक, पुलाव की लज़ीज़ता का मैं संरक्षक।

मैं ही शान्ती मन को देता, मैं हरा रंग लिए शान्ति का चिन्ह संपूर्ण । मुझे जो पाता तृप्त हो जाता”

अब श्वेत किरदार वाले नमक से भी रहा न गया, आख़िर कब तक सुनते वह सबकी अकड़।

“ मटर का पुलाव कैसा होगा बिन मेरे? मैं ही भोजन की एक अकेली जान हूँ , स्वाद भरा उसका प्राण हूँ।

मैंने ही समाया हर कण भीतर, पुलाव के स्तर का मैं ही अंतर। मैं दिखने में चाहे निम्न ही सही, मेरी प्रस्सनता सबके घर अंदर। भेद भाव न करता हूँ मैं, एक सा समाया सब के अन्दर। मैं ही मटर में, मैं ही अक्षत में, मैं ही जल में सार बन सबका, पहुँचता हर प्राणी के जिक्षासु तन भीतर। हॉं, मैं प्रेम ही तो हूँ।मेरी रसना करती न भेद और सबको जानती अपना समझ कर।”

तब प्याज़ महाराज को सुन मैं हुई अचम्भित। क्या अम्मॉ ने पुलाव में प्याज़ भी डाला था? हाय! न जाने और कितनी बातों से अन्जान थी मैं? हर उम्र में इसीलिए हैरान थी मैं।” हम प्याज़ ही सर्वमान्य हैं। हम जिस प्रकार व्यंजन को उत्साहित बनाते, हम ही उसकी आत्मा सम्मान हैं। सब की गंध अपने भीतर समाते, फिर भी अपनी अलग पहचान बनाते। हम हर व्यंजन का सार बन कर, सबका ही रूप बन जाते, किसी से वैर न निभाते। हम है अहिंसा के प्रतीक, हम ही अहिंसा का हैं रूप।”

इतना सुनते सुनते अब वह शांत न रह पाई। अब थी हमारी पुरानी सी देगची की बारी आई।

“ हाँ तुम सब हो सराहनीय, तुम सब हो स्वादिष्ट। मगर एक मैं ही हूँ जिसने तुम सब को समाया अपने अंदर। जो मैं न होती तो क्या रहता अस्तित्व तुम्हारा? क्या यूँ ही करता कोई, गुणगान तुम्हारा? अब भी कहती हूँ तुम सब मुझे जान लो, पहचान लो। है अलग अलग पहचान तुम्हारी, भाँति भाँति की नियति तुम्हारी। मैं ने जोड़ कर रखा तुम सबको तब कहीं बना यह मटर का पुलाव। मैं हूँ अनुशासन। मेरे रहते ही तुम सब एक सम एक व्यंजन बन पाए।”

इतनी देर से उछल कूद मचाते, कभी चावल के दानों तले, कभी पानी की उफान की सतह ज़ीरा जी अब ख़ामोश रह न सके। वह बोले, “ हमारे बग़ैर भी क्या मटर का पुलाव बना है कभी? हम जान जोखिम में रख, तपती ऑंच पर, गर्म घी में छौंके जाते, तड़प कर कूदते, छलाँग मारते,देगची भीतर नाच नाचते। हम भक्ति बन तुम सब के स्वाद को सम्भालते। हम हैं वह भक्ति जो जहाँ भी जाती, आत्माओं को आलंगिन करती, उनका सम्मान बढ़ाती।”

तब घी भी बोला, “ बहुत सुन ली मैंने तुम सब की तू तू मैं मैं।मैं ही सर्वश्रेष्ठ तुम सब से।

अपनी चिकनाई में तुम सब को ढाँपकर , हर एक सामग्री की अलग पहचान बढ़ाता। जो न मैं रहता पुलाव में तो शायद तुम सब का दलिया बन जाता। किया सुनिश्चित मैं ने कि तुम सब को मिलाकर स्वाद तो बने, मगर संग ही अपनी अपनी अलग एक पहचान भी रहे। मैं विभेदक तुम सब का दाता, सब का भ्राता, भेद भाव कोई न करता, सबका ही सम्मान मैं करता।”

अब पुलाव लगभग तैयार हो चुका था। अम्मॉं ने जो ढेर सारा पानी डाला था, वह लुप्त हो चुका था।

वह अपना आप खो कर, पर्वरतित हो चुका था। हल्की सी मुस्कान संग बोला, “ मैं ने तो अपना आप कर दिया समर्पण तुम सब को, तब जा कर यह पुलाव बन पाया। मैं घमंड न करता पर पूछता तुम सब से, जो मैं न रहता तो क्या तुम्हारा सब का साथ होकर भी कुछ हो पाता।मेरा अंश है तुम सब में और मैं हूँ दर्ढ़निश्यता।

अब अम्माँ ने ढक्कन खोल देगची के भीतर निहारा, चूल्हे की ऑंच बुझने से पहले अपना अहसास कराती बोली, “ सब की कहानी सही, मगर फिर भी कुछ कुछ ग़लत सी। यदि मैं अपनी कभी धीमी, कभी मध्यम एवं कभी तीखी गरमी की शक्ति न देती तो क्या बनता कभी यह मटर का पुलाव। सब अपने बखान किए जा रहे, पर यह न जाना कि शक्ति ही सबसे महान। मुझमें है वह ईश्वरीय ऊर्जा , वह ईश्वर की शक्ति जिसे भूल सब अपना करते गुणगान। याद करो, गुणगान से न होता है कोई महान। मेरी अग्नि, मेरा ताप , मेरी शक्ति है महान। मैं हूँ उस ईश्वर के समान, जिसकी कृपा बिन, फीका, नीरस जग का हर पकवान।

ईश्वर भी मुस्कुराए होंगे शायद सुनके ये ईश्वर का स्वर। अम्माँ ने अब चूल्हा बुझा कर, पुलाव मेज़ पर परोस दिया था। हम सब प्राणी भी पुलाव के उन सामग्रियों की ही तरह, अपना ही राग अलापते हैं और ईश्वर की कृपा भुला ख़ुद अपना ही गुण गाते हैं।

ऐसे ही एक ईश्वरीय युगपुरूष हमारे जग में आए, हमें एकता, प्यार, संस्कार सिखाने।

निज भीतर हैं कृष्ण तुम्हारे, हमको यह अहसास दिलाने, तपोवन महाराज के शिष्य वे प्यारे।

चिन्मय नाम लेकर जग ने जाना, ऐसे निष्पक्ष, दर्ढ़निशचयी वे गुरू हमारे।

गुरूदेव चिन्मयानन्द की जन्म जयन्ति के अवसर पर सादर भेंट

सिकीलधी

This is a dedication to the Master : Gurudev Swami Chinmayananda Ji, The Founder of Chinmaya Mission in a casual story format.

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Here’s the English Version as shared by my poetess friend Shariffa Keshavjee

The Voice of God*”
Steaming Hot Peas Biryani
Mouth-watering & Delicious.
Mother usually made Peas Biryani on Wednesday afternoons in winter. It was her favourite dish to prepare, for it was easy to make, yet a hot favourite amongst the kids. Moreover fresh peas were in season and tasted heavenly.
She heated some oil in a pan and added a spoonful of cumin seeds. Then she added a handful of chopped onions. She proceeded to add some green peas and seasoned them with salt and turmeric powder. Having sauteed them for a couple of minutes she turned in the cleaned and washed rice and poured in a good amount of water. She covered the pan with a lid and let it cook on a slow flame.
Strangely, the ingredients in the simmering pot started a conversation. The rice was the first to say, I am the most important of all of us present here for I am pure white and wholesome. I am the key ingredient to making Peas Biryani. I am *Sathya,* this is the *Truth.*
The yellow turmeric powder chuckled and said, No longer are you white my dear, for I have dyed you in my own colour. I am *Dharma. * This is my *duty.*
The peas smiled peacefully and said, What is Peas Biryani, without peas, eh? We are the most attractive and delicious part of this preparation. We are *shanti.*We are *peace.*We are peas (peace) and our colour too is green that is the *colour of peace.*
The salt mused to itself and said, Who would ever be able to eat Peas Biryani, without salt ?  I am the most important of all. If I were not there Peas Biryani would be unpalatable. My taste shall be infused in each particle. I am *prema.* I *love each one of you equally. *
The onions said, We add the tang to this dish. We add flavour. We are the soul of all vegetarian food. We are *ahimsa.*We *tolerate*all other flavours, yet retain our own.
The pan spoke up and said, Its I who is holding all of you in here. But for me, you would all have been separate identities. I have held you together, so that jointly, you can become a delicious dish. Where would you be without me ? I am *discipline *and I am *indispensable.*
The cumin seeds were dancing up and down in the boiling water and said, Try making Biryani, without us It shall be quite tasteless. We sizzle in the hot oil first of all for we are *devoted to spreading our flavour, wherever we go.*We are *devotion.*
The Biryani was almost ready and the oil glistened on every grain of rice. It said, I ensure that each grain of rice, each pea and each cumin seed, retains its individual identity. *I prevent stickiness.* I am *discrimination.*
The water was almost completely absorbed by now. It smiled contentedly and said, I was determined to permeate into each particle of all of you. Without me could peas Biryani ever have been made ?  I am *determination* and I am the most important of all.
Mother came by and checked to see, if the Biryani was done. The gas flame smiled quietly to itself and said, Each one is so full of its own importance. Without the power of heat provided by me, what would they be ? It is the *power of God *vested in me that I can give the energy to cook. But alas, who remembers the *power of God ?*
God smiled to Himself as the lady turned off the gas and waited, till ….He was needed again. 
*Each one of us in this world is so full of his or her importance. We conveniently forget God who gives us the power to do everything. Whether acknowledged or not, whether remembered or not, God is the power behind doing and making everything, even Peas Biryani.*
INCIDENTALLY, THIS ALSO PROVIDES ANOTHER LESSON…
*FOR OUR FRIENDSHIPS TO BE SUCCESSFUL LIKE MAKING OF THE BIRYANI WITH DIFFERENT INGREDIENTS, WE NEED ALL KINDS OF PEOPLE, NONE CAN BE LEFT OUT, *WHILE AT THE SAME TIME LIKE WE MUST VALUE THE PRESENCE OF GOD, WE MUST ALSO VALUE THE UNITY BETWEEN ALL OF US FRIENDS AND NONE MUST FEEL LEFT OUT”.*
Even one person left out will dent the value of friendship…like it will do to a Biryani if any one of the ingredients are left out._
*”If we focus on the eternal, we will remain unaffected by the changing experiences of life.”*

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