मगर वह जो चिर निद्रा सो रही….. मौत में भी आकर्षित लगती रही …. कितना सुंदर लगता है उस पर शृंगार…. जिन हाथों से कभी पहनाई थी वरमाला …… उन्हीं हाथों से अपनी पत्नी को विदाई वाली पहनाई माला
वीरानापन
बर्दाश्त की हद!
अब करे तो वह क्या करे..... अपने ही अकेलेपन में अपना सहारा बन, खुद को स्वयं ही समेटता..... अपने अतीत के बिखरे टुकड़े जोड़ता....