बर्सी का दिन

फिर आ गया आज वह दिन क्ष्राद्ध का महीना और बर्सी का दिन हर वर्ष यही तारीख़ जब आती दर्द भरी कुछ यादें ले आती डैडी आपका हम सब को छोड़ जाना जहाँ से दूर अपना जहाँ बनाना और फिर बस यादों की सीमा में बस जाना हुए तेइईस साल जब आप हुए रवाना मेरे … Continue reading बर्सी का दिन

सतगुरू स्वरूप

सतगुरू एक लेता नया आकार एवं बनता अनेक से एक। चोला बदल कर आया फिर से गुरू। निरंकारी समुदाय की सतगुरू माता सविंदर हरदेव के देहांत पश्चात उनकी सुपुत्री के सहयोग भरे कुछ शब्द पेश हैं

खटिया और कहानी

    दादी नानी की यह कहानी आँगन में जब बरसा पानी समेटा जा जल्दी से बिस्तर को खटिया तो थी भीग ही जानी रस्सी उसकी बदलनी ही थी हो चली थी बहुत ही पुरानी यादें समाई थी उस रस्सी पर नन्द भाभी की सुनी हर कहानी बोझ तले उन सब क़िस्सों के रस्सी ने … Continue reading खटिया और कहानी

एैसी वसीयत

एैसी एक वसीयत तुम कर जातीं नाम मेरे तुम्हारे गुन कर जातीं जिन से थी तुम्हारी पहचान एै मॉं मैं बस तेरे आँगन की एक हूँ क्यारी याद हैं आतीं बहुत ही मुझको बातें तुम्हारी वह प्यारी प्यारी जो थीं कभी सिखलाई तुमने उन बातों पर दिल जाता बलिहारी सिकीलधी