
ईश्वर (7th October)
अचानक जब खामोशी में
शांति भंग हो जाती है
चीख मार कर टेलीफोन …
निगोड़ा बच उठता है
जाने क्यों शरीर में….
एक सिहरन सी होती है
जाने कौन ख़बर होगी ?
अच्छी, या फिर बुरी होगी ?
क्या यह फ़ोन मम्मी का है?
या फिर जैकी अंकल का?
काश कि कह दें सब ठीक ठाक है
डैडी घर को गए आज हैं
मगर यह क्या ख़बर आ गई
चारों ओर उदासी छा गई
एक पल पहले कहती थी
हाँ, मेरे बड़े अच्छे बाप हैं
एक ही क्षण में मगर आज मैं
अचानक ही बे-बाप हो गई
रोना धोना करूँ किस लिए
विरलाप करूँ मैं आज किस लिए
मेरी तो इस एक ही पल में
‘ईश्वर’ से मुलाक़ात हो गई
झूठा रिश्ता टूट गया तो
सच्चे की पहचान हो गई
अपना अहसास दिलाने को
दैवी नाता समझाने को
क्या खेल रचाया मालिक
ऐ सारी सृष्टि के पालक
धन्य सबक़ सिखाया मुझको
डैडी को खोकर पाया तुमको
अब तू ही मेरा पिता व दाता
तू ही मेरा सखा व माता
जब तक मेरा जीवन शेष है
‘तू ही तू’ की रटन विशेष है
सिकीलधी (07/10/96)