ईद और तीज

कुछ ईद मनाते रहे 

कुछ अक्षय तीज मना गए

कोई दे क़ुर्बानी बकरे की

अपनी ख़ुशी मना रहेSikiladi

कोई बाँह पकड़ एक दूजे की

अपने संस्कार दर्शाते रहे 

कुछ की आज़ानें पहुँचीं कानों तक

किसी के शंखनाद ह्रदय को छू गए

किसी के रोज़ों में भी जीव हत्या हुई 

किसी के हर उपवास में फल आहार हुआ

किसी की सेवियों में उनकी मिठास सही 

कुछ के नारियल में धर्म की पावनता Sikiladi

किन्ही के नात नतमस्तक कराते होंगे 

किन्ही की घंटी पे भी सिर झुक जाते है

कोई हर दूजे को काफ़िर जानते हैं 

कोई हर ग़ैर को भी अपना मानते हैं Sikiladi

किसी का जश्न क़ुर्बानी माँगता है 

किसी का उत्सव फूल, पत्तों से सजता है 

कहीं गोश्त से महफ़िल सजती है 

कहीं हल्दी कुमकुम से स्वागत होता है 

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